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Story Moat Ka Baazigar Kshatipoorti Series Nagraj

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Story - Moat Ka Baazigar | Kshatipoorti  2


लेखक: नितिन मिश्रा | चित्रांकन: हेमंत कुमार | स्याहिकार: विनोद कुमार, ईश्वर आर्ट्स, स्वाति । रंगसज्जा: भक्त रंजन, सुनील दस्तूरिया । शब्दांकन: नीरू, मंदार । संपादक: मनीष गुप्ता

संख्या/कोड: SPCL-2610-H | भाषा: हिंदी |  पृष्ठ: 96 । मूल्य: 90.00

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Story Moat Ka Baazigar Kshatipoorti 2 Nagraj - Pic

कहानी - मौत का बाजीगर | क्षतिपूर्ति श्रंखला | राज कॉमिक्स

 नोट:- पूरी कॉमिक्स में कहीं भी घटनाक्रम भागों में नहीं दिखाए गए हैं। यहाँ पर दिए गए भागों  का मकसद केवल पाठकों को घटनाक्रम समझाना है।


क्षतिपूर्ति श्रंखला भाग दो, मौत का बाजीगर। आइए एक नजर डालते हैं इस कॉमिक की कहानी पर और कोशिश करते है जानने की, की आखिर क्यों कहलाया वो "मौत का बाजीगर"।  

कहानी सार: 

समयधाराएँ:

कहानी शुरू होती है एक ऐसे स्थान से जहाँ पर समय स्थिर है। जहाँ एक अज्ञात शख्स और एक औरत, एक अज्ञात इंसान को नागराज के जीवन की कहानी सुना रहे हैं। लेकिन वह अज्ञात इंसान उस अज्ञात शख्स की बताई कहानी पर संदेह करता है। वह कहता है की, "नागराज ने विसर्पी का स्वयंवर जीत लिया था और लंगारा जाती के आपत्ति जताने पर नागद्वीप छोड़ दिया था। उसके बाद वह अपने सपनों के मंदिर की तलाश में निकला था, नाकि हिमालयन रेंज पर दुश्मनों को खदेड़ने।" जवाब में अज्ञात शख्स कहता है की, "महानायक अपने कर्म से समयधाराओं की दो फाड़ करने की कूबत रखते हैं। नागराज की समयधाराएँ अलग हो गयी हैं, पूरा संसार सब कुछ दो फाड़ हो गया है। क्योंकि संसार को दोनों की ही आवश्यकता है, विश्वरक्षक की भी और आतंकहर्ता ही भी"।





अध्याय 00 (जीवन रास्ता तलाश ही लेता है) - 2 माह पहले हिमालय की घाटियाँ :

हिमालय की घाटी में बसे एक गाँव में अचानक भूकंप आता है, चटाने गिरती हैं, धरती का सीना फट जाता है। और धरती के सीने पर पड़ी दरारों में से एक शख्स बाहर निकलता है। लोग उसे भूकम्प के आने की बजह और मनहूस मान कर पत्थर मार मार कर गाँव से दूर भगा देते हैं। 
वर्तमान में अतीत की कुछ झलकियां दिखती हैं, "तक्षकनगर की महारानी ललिता उत्पन्न हो रहे खतरों को भांप कर अपने विश्वसनीय नागानंद और नागनाथ से बचन लेती है, की वह कभी भी युवराज को किसी भी सूरत में अकेला नहीं छोड़ेंगे"। धरती से निकला वह रहस्यमयी शख्स जंगल में अकेला है, नहीं शायद नहीं, दो नाग उसके साथ हैं। दोनों शायद आज भी अपना बचन निभा रहे हैं।


अध्याय 01 (लम्बा द्वंद्ध) - वर्तमान समय, अफ्रीका में तंजानिया के जंगल :

थोडांगा और उस अनजान शख्स मसाया में द्वंद्ध युद्ध आरम्भ होता है। अपनी फुर्ती और कलाबाजियों की मदद से मसाया थोडांगा से बचते बचाते ये बात समझ जाता ही कि इसे खुले अखाड़े से बाहर ले जाना होगा। वह अखाड़े से भाग कर जंगल के बीचों-बीच पहुँच जाता है। दो रहस्यमय शख्स इस पूरे घटनाक्रम पर नजर रखे हुए हैं। थोडांगा के पुराने दुश्मन और नागराज के दोस्त डेनियल और सीसी भी अपने पूरे दल-बल के साथ वहां पहुंच जाते हैं। वह थोडांगा पर हमला करने के उपयुक्त अवसर के इंतज़ार में हैं। थोडांगा मसाया पर हावी हो जाता है। तभी थोडांगा का चिर-परिचित प्रतिद्वंदी सतरंगा थोडांगा पर हमला बोल देता है। इसके साथ ही डेनियल और सीसी भी हमला शुरू कर देते हैं, जवाब में थोडांगा अपने प्रशिक्षित कबीलेवासियों और हथियारों से लेस जंगली जानवरों को बुला लेता है। इस लड़ाई में थोडांगा डेनियल और सीसी को हरा देता है। लेकिन मसाया अपने अंतर्मन में गूंजती आवाज का अनुसरण कर नागों की मदद से पासा पलट देता है। थोडांगा के सींग एक बार फिर से उसके ही दुश्मन बन जाते हैं। उसे नागराज के साथ हुई अपनी पुरानी मुठभेड़ याद आ जाती है, जिसमे नागराज ने ठीक इसी तरह उसके सींगों को जमीन में गाड़ कर उसे दो फाड़ कर दिया था। थोडांगा को समझते देर नहीं लगती कि यह नागराज ही है, लेकिन इस बार एक अलग एक नए रूप में। लेकिन थोडांगा की किस्मत इस बार उसका साथ देती है और इस बार मिस किलर उसके दो फाड़ होने से ठीक पहले ट्रांसमिट कर अपने पास बुला लेती है।


अध्याय 02 (भाग 1) (रहस्यमयी रक्षक) - वर्तमान समय, मिस किलर का मुख्यालय, हिरोशिमा जापान: 

मिस किलर ने नागमणि के साथ मिलकर अपराध जगत के नये, पुराने और धुरंधर चेहरों को इकठ्ठा किया है। थोडांगा मिस किलर को कहता है कि अगर तुम समय पर मुझे ट्रांस्मिट नहीं करती तो आज नागराज मुझे मार ही डालता। मिस किलर थोडांगा से कहती है कि नागराज एक ही समय पर दो जगह कैसे हो सकता है, वह तो न्यूयॉर्क में है। न्यूयॉर्क पर हुए हमले के बाद आतंकहर्ता नागराज एक बार फिर से वापस आ चुका है और यही वजह है की हम सब यहाँ इकठ्ठा हुए हैं।


अध्याय 02 (भाग 2) - वर्तमान समय, न्यूयॉर्क अमेरिका: 

बेहोश सौडांगी को नागराज थाम लेता है, होश में आने पर सौडांगी अपनी आँखों पर विश्वास नहीं होता। वह सोचती है कि नागू एक बार फिर से नागराज का रूप धर कर आया है। लेकिन नागराज के हाथों से निकलते नाग, वह नागरस्सी, उसके बात करने का अंदाज़, उसकी अपराध के प्रति वही नफरत, अपराध के खात्मे का उसका वही जनून सौडांगी को यह मानने के लिए मजबूर कर देता है की, यही है आतंकहर्ता नागराज।


अध्याय 02 (भाग 3) - वर्तमान समय, अज्ञात स्थान: 

जिसके इशारे पर इच्छाधारी आतंकबाद अपने पैर पसार रहा है, वह पैराडॉक्स नागराज की वापसी को देख कर थोड़ा घबराता है। यह जानने के लिए की क्या यही असली नागराज है, वह अपनी वेनोम फ़ोर्स को कुछ और शक्तियां प्रदान करता है। न्यूयॉर्क में विचित्र क्रिस्टल जैसे अंडे उत्पन होने लगते हैं, जिनमे नाग हैं। और इन अण्डों के फूटने पर उनमे से निकलते हैं इच्छाधारी सरिसर्प। एक तरफ वेनोम फाॅर्स के इच्छाधारी आतंकबादी, तो दूसरी ओर विशालकाय इच्छाधारी सरिसर्प। नागराज इस दोतरफा आक्रमण का सामना करता है, लेकिन इसी बीच बगदादी सौडांगी को अपने कब्जे में ले लेता है। नागराज हथियार डालने को मजबूर जो जाता है। लेकिन तभी ऊर्जा किरणों के वार इच्छाधारी आतंकबादियों को निस्तेनाबूत कर देते हैं, और सौडांगी स्वतन्त्र हो जाती है। क्यूंकि मैदान में आ चुका है मणिधारक नागू, और उसके साथ है नागराज पर जान छिड़कने वाला उसका नाग-परिवार, उसके विश्वसनीय नागयोद्धा, उसके इच्छाधारी नागसाथी।


अध्याय 03 - (षड़यंत्र): 

वह अज्ञात इंसान जो नागराज के जीवन की कहानी सुन रहा है, वह कहानी सुनाने वाले अज्ञात शख्स के सामने अपना सवाल रखता है, "तुम्हारे अनुसार विसर्पी के स्यंवर के प्रकरण और नागराज के उस दोहरे निर्णय से पूर्व, विश्वरक्षक और आतंकहर्ता एक ही थे। यदि ये सत्य है तो नागराज के जन्म की पूर्वकथा भी एक ही होनी चाहिए। फिर इसमें भिन्नता क्यों?"  
जवाब में अज्ञात शख्स कहता है, "तुमने जो भी कहा वह सत्य है परन्तु पूर्ण सत्य नहीं। नागराज के एक भिन्न निर्णय ने यदि उसकी समयधारा को दो फाड़ कर दिया, तो उसके जन्म के समय अवश्य ही तकशकनगर में भी किसी ने दो विमुख निर्णय लिए थे। जिन्होंने तकशकनगर की समयधरा को भी दो फाड़ कर दिया।" 
वह तकशकनगर के इतिहास की कहानी सुनाना शुरू करता है, "तबाही खान, एक ऐसी तबाही जो अनगिनत देशों में मौत का परचम फहरा चुकी थी और अब वह बढ़ रही थी भारतवर्ष की और। परन्तु भारतवर्ष की सीमायें तकशकनगर से होकर गुजरती थी और तकशकनगर की सरहद को चक्रवर्ती सम्राट तक्षकराज के रहते कोई भेद नहीं सकता था। तबाही खान ने कई बार प्रयास किये, लेकिन हर बार उसे मुंह की खानी पड़ी। तब तकशकनगर के सेनाधीश और तक्षकराज के भाई नागपाशा ने तबाही खान के सम्मुख अपनी एक कुटिल पेशकश रखी और उसे साथ देने को कहा। इसी बीच तकशकनगर के राज ज्योतषी और सम्राट तक्षकराज के मित्र वेदाचार्य तक्षकराज को आने वाले भीषण खतरे से आगाह करते हैं। और तक्षकरज को देव कालजयी की पूजा अर्चना करने निकल चुकी महारानी ललिता को रोकने को कहते हैं। इसी दौरान नागपाशा कुछ सोचते हुए अचानक ठिठक जाता है और कहता है की सारी गणना उलटी हो गयी। अपनी गलती सुधारने के लिए वह भी महारानी ललिता को देव कालजयी की पूजा अर्चना करने से रोकने निकल पड़ता है। लेकिन वेदाचार्य का अंगरक्षक अमुख उसका रास्ता रोक लेता है। वहीँ दूसरी और महारानी ललिता को रोकने निकले सम्राट तक्षकरज का रास्ता रोके खड़ा है एक और नागपाशा। दोनों ही घटनाक्रमों में से कोई भी शख्स महारानी को रोकने में सफल नहीं हो पाता और आखिरकार वही होता है जिसका की डर था, अनर्थ"।


अध्याय 04 - (भूला हुआ रक्षक):  

एक अज्ञात महिला कुछ साधारण बदमाशों को किसी लड़की की तस्वीर दिखती है और उन्हें कहती है, "यह लड़की कुछ ही देर में मुंबई से अमेरिका जाने वाली है। तुम्हारा काम है इस लड़की को बंधक बना कर सही सलामत मेरे पास लेकर आना है।" 
कुछ देर बाद वह लड़की मुंबई बंदरगाह आ पहुँचती है, ये लड़की कोई और नहीं राजकुमारी विसर्पी है। बदमाश उसे रोकने की कोशिश करते हैं, पर विसर्पी उन पर भारी पड़ती है। अंत में बदमाश उस महिला द्वारा दी गयी मूर्ती का प्रयोग कर विसर्पी पर काबू पा लेते हैं। वह मूर्ति असल में फनहारी है, जिसके सामने हर इच्छाधारी नाग बेबस हो जाता है। विसर्पी अब मुसीबत मैं है, लेकिन तभी वहां एक शख्स विसर्पी की मदद के लिए आ पहुँचता है। यह शख्स और कोई नहीं ये है, राज.


आगे की कहानी जारी रहेगी 'विषप्रस्त' में। तो दिल थाम के इंतजार कीजिये आगामी और क्षतिपूर्ति श्रृंखला के तीसरे भाग विषप्रस्त का। 

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Review - Moat Ka Baazigar Nagraj

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